शुक्रवार, 8 अगस्त 2025

क़ाफूर होंगें गम ख़ुशियों की बयार में






 क़ाफूर होंगें गम  ख़ुशियों  की बयार में 

ये एक भ्र्म तो था तुम्हारे इंतज़ार में 

अच्छा किया उम्मीद की ठुकराई अर्जियां 

खुद ही जुटाये हौसले  जग के बज़ार में 

वंदना बाजपेयी 



कुछ अधूरी हसरतें  कुछ बेतुकी  पाबंदियां 

साथ चलती ही रहीं  बेमेल सी  तुकबंदियाँ 

शाम आने पर  उमर की, जब बही-खाते खुले 

वक्त पर पत्थर सरीखी तब लगीं हदबंदियां 

वंदना बाजपेयी 




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